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Thursday, 16 May 2013

"मैंने गाँधी को क्यों मारा " ? नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान




{इसे सुनकर अदालत में उपस्तित सभी लोगो की आँखे गीली हो गई थी और कई तो रोने लगे थे एक जज महोदय ने अपनी टिपणी में लिखा था की यदि उस समय अदालत में उपस्तित लोगो को जूरी बना जाता और उनसे फेसला देने को कहा जाता तो निसंदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्देश देते }

नाथूराम जी ने कोर्ट में कहा-- सम्मान, कर्तव्य और अपने देश वासियों के प्रति प्यार कभी कभी हमे अहिंसा के सिधांत से हटने के लिए बाध्य कर देता है मैं कभी यह नहीं मान सकता की किसी आक्रामक का शसस्त्र प्रतिरोध करना कभी गलत या अन्याय पूर्ण भी हो सकता है प्रतिरोध करने और यदि संभव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करना, मैं एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूँ मुसलमान अपनी मनमानी कर रहे थे या तो काँग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी सनक, मनमानी और आदिम रवैये के स्वर में स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाये वे अकेले ही प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति के निर्णायक थे महात्मा गाँधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे

गाँधी ने मुस्लिमो को खुश करने के लिए हिंदी भाषा के सोंदर्य और सुन्दरता के साथ बलात्कार किया गाँधी के सारे प्रयोग केवल और केवल हिन्दुओ की कीमत पर किये जाते थे जो कांग्रेस अपनी देश भक्ति और समाज वाद का दंभ भरा करती थी उसीने गुप्त रूप से बन्दुक की नोक पर पकिस्तान को स्वीकार कर लिया और जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया मुस्लिम तुस्टीकरण की निति के कारण  भारत माता के टुकड़े कर दिए गए और 15 अगस्त 1947 के बाद देश का एक तिहाई भाग हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई

नेहरू तथा उनकी भीड़ की स्विकृती के साथ ही एक धर्म के आधार पर राज्य बना दिया गया इसी को वे बलिदानों द्वारा जीती गई सवंत्रता कहते है किसका बलिदान? जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओ ने गाँधी के सहमती से इस देश को काट डाला, जिसे हम पूजा की वस्तु मानते है तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया मैं साहस पूर्वक कहता हु की गाँधी अपने कर्तव्य में असफल हो गए उन्होंने स्वयं को पकिस्तान का पिता होना सिद्ध किया
 
मैं कहता हूँ की मेरी गोलियां एक ऐसे व्यक्ति पर चलाई गई थी, जिसकी नित्तियों और कार्यो से करोडों हिन्दुओं को केवल बर्बादी और विनाश ही मिला ऐसी कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके द्वारा उस अपराधी को सजा दिलाई जा सके इसलिये मैंने इस घातक रास्ते का अनुसरण किया मैं अपने लिए माफ़ी की गुजारिश नहीं करूँगा, जो मैंने किया उस पर मुझे गर्व है मुझे कोई संदेह नहीं है की इतिहास के इमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तोल कर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्यांकन करेंगे

जब तक सिन्धु नदी भारत के ध्वज के नीछे से ना बहे तब तक मेरी अस्थियों का विसर्जन मत करना।

Monday, 4 March 2013

क्यों मोदी को नहीं पसंद करता अमरीका?



जब यह खबर आई कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अमरीका में व्हार्टन इंडिया इकॉनोमिक फोरम में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संबोधन करने वाले हैं तो चर्चा होने लगी कि क्या अगला कदम अमरीका का वीज़ा हो सकता है. लेकिन उनके भाषण के रद्द होने की खबर ने ऐसे कयासों को खत्म किया ही साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि अमरीका मोदी के प्रति शायद नरम नहीं पड़ा है.

हालांकि पिछले दिनों ब्रिटेन के उच्चायुक्त की मोदी से मुलाकात और फिर हाल में यूरोपीय संघ के नेताओं के भी उनसे मिलने से ऐसे संकेत मिलने लगे थे कि शायद पश्चिमी देशों ने उनसे दूरी बनाए रखने की अपनी नीति बदली है. ऐसा माना गया कि शायद इसके कारण आर्थिक आधार हो सकते हैं जो आजकल नीतियां तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन अगर ऐसा है भी तो अमरीका की नीति में फिलहाल कोई बदलाव नज़र नहीं आया है.

क्यों हुआ रद्दमोदी के क्लिक करें भाषण को रद्द करने के फैसले के बारे में फोरम के कहा, "हम मानते हैं कि (उनके संबोधन को रद्द करने का) ये फैसला बहुत से भागीदारों की प्रतिक्रियाओं को देखते हुए एक उचित कदम है." दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार भरत भूषण कहते हैं, ''व्हार्टन इंडिया इकॉनोमिक फोरम का आयोजन छात्र करते हैं. बाकी छात्रों और प्रोफेसरों ने इसका विरोध किया है. लेकिन अगर विरोध नहीं करते तो भी कोई गारंटी नहीं थी कि अमरीका उन्हें वीज़ा देता.'' लेकिन जब ब्रिटेन और यूरोपीय संघ की सोच बदली है तो अमरीका की क्यों नहीं?

भरत भूषण कहते हैं, ''देखिए न ब्रिटेन ने और न यूरोपियन संघ ने उन्हें वीज़ा दिया है. और अगर वो देते भी तो मोदी वहां जाते या नहीं यह कहना मुश्किल है कि कहीं उन्हें गिरफ्तार न कर लिया जाए. आपको याद होगा कि चिली के (जनरल ऑगस्तो) पिनोशे ऐसे ही गिरफ्तार हुए थे.'' उनका कहना है, ''जब 2000 से अधिक लोगों का कत्ल हुआ तब वो मुख्यमंत्री थे और वो कुछ भी इसकी ज़िम्मेदारी नहीं मानते. बहुत सारे लोगों का मानना है कि उन्होंने इसमें अनदेखी की थी. इन लोगों का मानना है कि इसके लिए उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए.''

छवि और विकास

''अपनी छवि सुधारने के लिए वो विकास की बात करते हैं. लेकिन अयोध्या को 20 साल हो गए हैं और आज तक आडवाणी की छवि ठीक नहीं हुई. अयोध्या के बाद वे मोहम्मद जिन्ना की मज़ार पर भी जा कर आ गए और जो लिखना है लिख दिया." लेकिन जब आर्थिक कारण नीति निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाने लगी है तो क्या अमरीका नीति नहीं बदलेगा?

भारत भूषण कहते हैं, ''मैं कह नहीं सकता भविष्य में ऐसा होगा या नहीं लेकिन फिलहाल तो ऐसा नज़र नहीं आ रहा.'' अमरीका का रुखवे कहते हैं, ''जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की होने वाले बैठक में अमरीका श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव ला रहा है कि कैसे उसने निर्दोष लोगों को मारा था. आप सोचते हैं कि 2000 लोगों का सर कलम कर दिया जाएगा और सारी दुनिया चुप रहेगी? वो ज़माने गए.''

ब्रिटेन के उच्चायुक्त के उनसे मिलने को भी वे कोई बड़ी बात नहीं मानते. वे कहते हैं, ''ब्रिटेन के उच्चायुक्त उन्हें मिले ज़रूर लेकिन उन्होंने यह तो नहीं कहा कि वे उन्हें वीज़ा देंगे.
इसका तर्क देते हुए वे कहते हैं, ''हमारे राजनयिक पाकिस्तान के बड़े बड़े नेताओं से मिलते हैं. लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं के कि उनसे सहमत है और जो विवादित मुद्दे हैं वो दरी के नीचे छिपा दिए जाएंगे.''

Monday, 27 August 2012

हम से इतनी नफरत क्यों ?

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य का सबसे दुखद पहलू यह है कि भारत के मध्य वर्ग की निगाह में राजनीति और राजनेताओं के लिए वैसा सम्मान नहीं है, जैसा आज़ादी के बाद शुरुआती दिनों में मिलता था.

वर्ष 1947 में आजा़दी मिलने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था लेकिन वे अकेले नहीं थे जिन्हें लोगों से प्रशंसा मिली.

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, उनके केबिनेट के अन्य सदस्य सरदार पटेल, बल्लभ पंत, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे बहुत से लोग थे जिन्होंने अपने आपको स्वतंत्रता सेनानी से राजनेता के रुप में ढाला और दो दशकों तक देश चलाते रहे.

यहाँ तक कि संविधान निर्माता बीआर अंबेडकर जैसे कई विपक्षी दलों के नेताओं के भी कई समर्थक थे और उनकी सत्यनिष्ठा की वजह से उनकी इज़्ज़त की जाती थी. हालांकि 1960 के दशक के अंत से मध्यवर्ग के लोगों की नज़रों में राजनेताओं की छवि धूमिल होने का सिलसिला शुरु हो गया.

कांग्रेस का वामपंथीकरण

ये सिलसिला इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के ज़माने में भी जारी रहा जो अपने ज़मानों के लोकप्रिय नेता थे. राजनीति से मध्यवर्ग के मोहभंग होने के सिलसिले को चार दशक पहले जाकर देखना होगा, जब इंदिरा गांधी ने लोकप्रियता की ताक़त को पहचाना.

कांग्रेस पार्टी के पुराने लोगों के एक गुट ने शुरुआत में इंदिरा गांधी को ये सोचकर प्रधानमंत्री बनाया था कि वो उनके हाथों की कठपुतली बनी रहेंगीं, लेकिन उन्होंने पार्टी और सरकार दोनों को वामपंथ की ओर झुकाने का चौंकाने वाला क़दम उठाया और उन सभी को पीछे छोड़ दिया. टैक्स बढ़ाने, बैंकों और कुछ उद्योगों के राष्ट्रीयकरण जैसे कई लोकवादी निर्णय लेकर उन्होंने सरकार पर अपनी पकड़ मज़बूत की और अपने परिवार के ज़रिए पार्टी पर. इससे पहले कांग्रेस मध्यमार्गी पार्टी थी जो समाज के सभी हिस्सों को साथ लेकर चलना चाहती थी लेकिन लगातार बढ़ते ग़रीब वोटरों के साथ पहचान बनाने के लिए इंदिरा गांधी ने पार्टी की दशकों पुरानी नीति का पलट दिया.

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अतुल कोहली ने लिखा है, " ग़रीब और निरक्षर नागरिक बड़ी संख्या में राजनीतिक लामबंदी के लिए तैयार थे...इंदिरा गांधी ने वामपंथी रुख़ अपनाकर कांग्रेस के चुनावी भाग्य को नए सिरे से बनाने का रास्ता तलाश लिया. " ये चतुराई से खेला गया एक जुआ था जिसका फ़ायदा चुनाव में मिला. लेकिन इस प्रक्रिया में अपेक्षाकृत छोटे मध्यमवर्ग ने राजनीति में अपनी शक्तिहीनता और अपनी निर्थकता ही ज़ाहिर की. इसके बाद की एक चौथाई सदी में भारत आर्थिक रुप से कमज़ोर बना रहा और सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ता रहा, मध्यम वर्ग राजनीति के हाशिए में धकेले जाने को लेकर शांत बैठा रहा और फिर उदासीन हो गया. जो लोग सक्षम थे उन्होंने अपनी गति बाहर निकलने में देखी और प्रवासी हो गए, जो बच गए उनके भीतर आक्रोश उबलता रहा और उन्होंने चुनावों में मतदान करने की परवाह ही नहीं की. हालांकि इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बाद मध्यम वर्ग का विश्वास भी जीत लिया, जिसमें बांग्लादेश को पाकिस्तान से अगल करके एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया और इसके बाद मध्यमवर्ग का राजनीतिक रिश्ता हमेशा के लिए बदल गया.

अकेली नहीं कांग्रेस

वैसे कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं थी जिसने मध्यमवर्ग को राजनीति से दरकिनार किया. वर्ष 1989 में रक्षा घोटाले के आरोपों ने मध्यमवर्ग को आंदोलित कर दिया और चुनाव में राजीव गांधी की हार हो गई.

इसके बाद जनता दल की सरकार आई जिसके प्रधानमंत्री वीपी सिंह थे, जो अपने शुरुआती दिनों में बहुत लोकप्रिय थे. लेकिन अपने गठबंधन के दलों की आपसी लड़ाई के बीच एक वर्ष से भी कम समय में ही वीपी सिंह ने मध्यम वर्ग के बीच अपनी लोकप्रियता खो दी. और तब उन्होंने लंबे समय से बोतल में बंद राजनीतिक जिन्न को बाहर निकालने का फ़ैसला किया, वह था पिछड़ा वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का मामला. हालांकि उनका यह लोकलुभावन क़दम भी उनकी सरकार को नहीं बचा पाया लेकिन इसने जाति आधारित राजनीति का एक दशक दे दिया, जिससे मध्यवर्ग प्रसन्न नहीं था. वर्ष 1991 के बाद हुए आर्थिक सुधारों ने भारत में विकास की स्थिति में सुधार किया. इन सुधारों को डेढ़ दशक तक केंद्र में आई हर सरकार ने जारी रखा. इन सुधारों से मध्यम वर्ग की स्थिति बेहतर हुई. उनके वेतन में बढ़ोत्तरी हुई, पहले जिन्हें विलासिता की वस्तु माना जाता था, जैसे मकान, गाड़ियाँ और उपभोक्ता वस्तुएँ, वो सब खरीदने में मध्यमवर्ग सक्षम हो गया.

सॉफ़्टवेयर और टेलीकॉम जैसे नए सेक्टर ने विश्व स्तर की नौकरियों के अवसर दिए और इसने पहले बाहर चले गए लोगों को वापस भारत लाने की प्रक्रिया शुरु कर दी. लेकिन इन सबसे मध्यवर्ग की राजनीति के प्रति गहरी हो चली उदासीनता ख़त्म नहीं हो सकी. यहाँ तक कि मध्यमवर्ग में अपनी राजनीति की जड़ों की तलाश करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी इस वर्ग को लंबे समय तक नहीं रिझा सकी.

1998 से छह वर्षों तक सरकार में रहने के बाद वर्ष 2004 में भाजपा ने लगाकार बढ़ रहे मध्यमवर्ग को ही ध्यान में रखकर अपनी चुनावी रणनीति तय की और 'इंडिया शाइनिंग' का नारा दिया. वह भी व्यर्थ रहा और यह उन लोगों के बीच असर डालने में विफल रहा जो अभी भी मध्यम वर्ग में शामिल नहीं हो पाए थे और शायद उनको भी नहीं जो मध्यम वर्ग में थे.

गहराती निराशा

इसके बाद दिल्ली में भ्रष्टाचार के बड़े मामलों और पूंजीवाद से दोस्ताना रिश्तों के प्रदर्शनों ने मध्यमवर्ग की उदासीनता को बढ़ाया ही है. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ समाजिक कार्यकर्ता किशन बाबूराव 'अन्ना' हज़ारे के आंदोलन ने पिछले साल असामान्य रुप से बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया था, लेकिन इस वर्ष ये आंदोलन धराशाई हो गया क्योंकि उनके समर्थक संसद में लोकपाल की नियुक्ति की दिशा में प्रगति न होने से हतोत्साहित हो गए.

इसके साथ राजनीतिक धन जुटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव और लगभग हर पार्टी में खुले भाई भतीजावाद ने राजनीतिज्ञों के प्रति मध्यमवर्ग की निराशा को और पक्का कर दिया.
इसके बावजूद मध्यम वर्ग इस समय सबसे प्रभावशाली है. उसका आकार अब बहुत बड़ा है और उसके खर्च करने की क्षमता भी बढ़ी है, इसीलिए वह मीडिया को बाध्य करता है कि वह उसकी प्राथमिकताओं और चिंताओं का ध्यान रखे.

एक तर्क दिया जाता है कि यदि यह मध्यमवर्ग जाग गया तो उसके वोटों से चुनाव की दिशा बदल सकती है इसलिए आश्चर्य होता है कि क्यों कुछ ही क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने ये रास्ता तलाश करने की कोशिश की है कि अपने दूसरे वोट बैंकों को नाराज़ किए बिना किस तरह मध्यवर्ग को अपने साथ लाया जाए. वह भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तन का समय होगा जब बड़ी पार्टियाँ इसे राष्ट्रीय स्तर पर करने में सफल हो सकेंगीं.

Sunday, 18 December 2011

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