मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य का सबसे दुखद पहलू यह है कि भारत के मध्य वर्ग की निगाह में राजनीति और राजनेताओं के लिए वैसा सम्मान नहीं है, जैसा आज़ादी के बाद शुरुआती दिनों में मिलता था.
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, उनके केबिनेट के अन्य सदस्य सरदार पटेल, बल्लभ पंत, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे बहुत से लोग थे जिन्होंने अपने आपको स्वतंत्रता सेनानी से राजनेता के रुप में ढाला और दो दशकों तक देश चलाते रहे.
यहाँ तक कि संविधान निर्माता बीआर अंबेडकर जैसे कई विपक्षी दलों के नेताओं के भी कई समर्थक थे और उनकी सत्यनिष्ठा की वजह से उनकी इज़्ज़त की जाती थी. हालांकि 1960 के दशक के अंत से मध्यवर्ग के लोगों की नज़रों में राजनेताओं की छवि धूमिल होने का सिलसिला शुरु हो गया.
कांग्रेस का वामपंथीकरण
ये सिलसिला इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के ज़माने में भी जारी रहा जो अपने ज़मानों के लोकप्रिय नेता थे. राजनीति से मध्यवर्ग के मोहभंग होने के सिलसिले को चार दशक पहले जाकर देखना होगा, जब इंदिरा गांधी ने लोकप्रियता की ताक़त को पहचाना.कांग्रेस पार्टी के पुराने लोगों के एक गुट ने शुरुआत में इंदिरा गांधी को ये सोचकर प्रधानमंत्री बनाया था कि वो उनके हाथों की कठपुतली बनी रहेंगीं, लेकिन उन्होंने पार्टी और सरकार दोनों को वामपंथ की ओर झुकाने का चौंकाने वाला क़दम उठाया और उन सभी को पीछे छोड़ दिया. टैक्स बढ़ाने, बैंकों और कुछ उद्योगों के राष्ट्रीयकरण जैसे कई लोकवादी निर्णय लेकर उन्होंने सरकार पर अपनी पकड़ मज़बूत की और अपने परिवार के ज़रिए पार्टी पर. इससे पहले कांग्रेस मध्यमार्गी पार्टी थी जो समाज के सभी हिस्सों को साथ लेकर चलना चाहती थी लेकिन लगातार बढ़ते ग़रीब वोटरों के साथ पहचान बनाने के लिए इंदिरा गांधी ने पार्टी की दशकों पुरानी नीति का पलट दिया.
प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अतुल कोहली ने लिखा है, " ग़रीब और निरक्षर नागरिक बड़ी संख्या में राजनीतिक लामबंदी के लिए तैयार थे...इंदिरा गांधी ने वामपंथी रुख़ अपनाकर कांग्रेस के चुनावी भाग्य को नए सिरे से बनाने का रास्ता तलाश लिया. " ये चतुराई से खेला गया एक जुआ था जिसका फ़ायदा चुनाव में मिला. लेकिन इस प्रक्रिया में अपेक्षाकृत छोटे मध्यमवर्ग ने राजनीति में अपनी शक्तिहीनता और अपनी निर्थकता ही ज़ाहिर की. इसके बाद की एक चौथाई सदी में भारत आर्थिक रुप से कमज़ोर बना रहा और सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ता रहा, मध्यम वर्ग राजनीति के हाशिए में धकेले जाने को लेकर शांत बैठा रहा और फिर उदासीन हो गया. जो लोग सक्षम थे उन्होंने अपनी गति बाहर निकलने में देखी और प्रवासी हो गए, जो बच गए उनके भीतर आक्रोश उबलता रहा और उन्होंने चुनावों में मतदान करने की परवाह ही नहीं की. हालांकि इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बाद मध्यम वर्ग का विश्वास भी जीत लिया, जिसमें बांग्लादेश को पाकिस्तान से अगल करके एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया और इसके बाद मध्यमवर्ग का राजनीतिक रिश्ता हमेशा के लिए बदल गया.
अकेली नहीं कांग्रेस
वैसे कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं थी जिसने मध्यमवर्ग को राजनीति से दरकिनार किया. वर्ष 1989 में रक्षा घोटाले के आरोपों ने मध्यमवर्ग को आंदोलित कर दिया और चुनाव में राजीव गांधी की हार हो गई.इसके बाद जनता दल की सरकार आई जिसके प्रधानमंत्री वीपी सिंह थे, जो अपने शुरुआती दिनों में बहुत लोकप्रिय थे. लेकिन अपने गठबंधन के दलों की आपसी लड़ाई के बीच एक वर्ष से भी कम समय में ही वीपी सिंह ने मध्यम वर्ग के बीच अपनी लोकप्रियता खो दी. और तब उन्होंने लंबे समय से बोतल में बंद राजनीतिक जिन्न को बाहर निकालने का फ़ैसला किया, वह था पिछड़ा वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का मामला. हालांकि उनका यह लोकलुभावन क़दम भी उनकी सरकार को नहीं बचा पाया लेकिन इसने जाति आधारित राजनीति का एक दशक दे दिया, जिससे मध्यवर्ग प्रसन्न नहीं था. वर्ष 1991 के बाद हुए आर्थिक सुधारों ने भारत में विकास की स्थिति में सुधार किया. इन सुधारों को डेढ़ दशक तक केंद्र में आई हर सरकार ने जारी रखा. इन सुधारों से मध्यम वर्ग की स्थिति बेहतर हुई. उनके वेतन में बढ़ोत्तरी हुई, पहले जिन्हें विलासिता की वस्तु माना जाता था, जैसे मकान, गाड़ियाँ और उपभोक्ता वस्तुएँ, वो सब खरीदने में मध्यमवर्ग सक्षम हो गया.
सॉफ़्टवेयर और टेलीकॉम जैसे नए सेक्टर ने विश्व स्तर की नौकरियों के अवसर दिए और इसने पहले बाहर चले गए लोगों को वापस भारत लाने की प्रक्रिया शुरु कर दी. लेकिन इन सबसे मध्यवर्ग की राजनीति के प्रति गहरी हो चली उदासीनता ख़त्म नहीं हो सकी. यहाँ तक कि मध्यमवर्ग में अपनी राजनीति की जड़ों की तलाश करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी इस वर्ग को लंबे समय तक नहीं रिझा सकी.
1998 से छह वर्षों तक सरकार में रहने के बाद वर्ष 2004 में भाजपा ने लगाकार बढ़ रहे मध्यमवर्ग को ही ध्यान में रखकर अपनी चुनावी रणनीति तय की और 'इंडिया शाइनिंग' का नारा दिया. वह भी व्यर्थ रहा और यह उन लोगों के बीच असर डालने में विफल रहा जो अभी भी मध्यम वर्ग में शामिल नहीं हो पाए थे और शायद उनको भी नहीं जो मध्यम वर्ग में थे.
गहराती निराशा
इसके बाद दिल्ली में भ्रष्टाचार के बड़े मामलों और पूंजीवाद से दोस्ताना रिश्तों के प्रदर्शनों ने मध्यमवर्ग की उदासीनता को बढ़ाया ही है. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ समाजिक कार्यकर्ता किशन बाबूराव 'अन्ना' हज़ारे के आंदोलन ने पिछले साल असामान्य रुप से बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया था, लेकिन इस वर्ष ये आंदोलन धराशाई हो गया क्योंकि उनके समर्थक संसद में लोकपाल की नियुक्ति की दिशा में प्रगति न होने से हतोत्साहित हो गए.
इसके साथ राजनीतिक धन जुटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव और लगभग हर पार्टी में खुले भाई भतीजावाद ने राजनीतिज्ञों के प्रति मध्यमवर्ग की निराशा को और पक्का कर दिया.
इसके बावजूद मध्यम वर्ग इस समय सबसे प्रभावशाली है. उसका आकार अब बहुत बड़ा है और उसके खर्च करने की क्षमता भी बढ़ी है, इसीलिए वह मीडिया को बाध्य करता है कि वह उसकी प्राथमिकताओं और चिंताओं का ध्यान रखे.
एक तर्क दिया जाता है कि यदि यह मध्यमवर्ग जाग गया तो उसके वोटों से चुनाव की दिशा बदल सकती है इसलिए आश्चर्य होता है कि क्यों कुछ ही क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने ये रास्ता तलाश करने की कोशिश की है कि अपने दूसरे वोट बैंकों को नाराज़ किए बिना किस तरह मध्यवर्ग को अपने साथ लाया जाए. वह भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तन का समय होगा जब बड़ी पार्टियाँ इसे राष्ट्रीय स्तर पर करने में सफल हो सकेंगीं.
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